गोटुल क्या है?
गोटुल आदिवासी समाज की प्राचीन सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्था है, जहाँ युवा जीवन के अनुशासन, सेवा, ज्ञान, कला, परंपरा और सामुदायिक जिम्मेदारी को सीखते हैं।
1 गोटुल क्या है?
विश्व में आदिम जनजातियों के युवक-युवतियों का भावी जीवन उन्नत बनाने के लिये उन्हें उचित अवसर दिये जाते हैं। भारतीय आदिम जनजाति समाज में भी कुछ ऐसी ही रीति-नीति है, जिसमें जनजाति समाज के युवा जीवन की झांकियां मिलती हैं, जहाँ पर गोटुल के दर्शन होते हैं।
गोटुल आदिवासी जनजाति समाज की एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राचीनतम सामाजिक संस्था है, जो प्राचीन आदिकाल से चलती आयी है। परंतु 1990 के दशक में बस्तर जिले का अंतिम गोटुल भी दम तोड़ चुका था।
गोटुल शब्द से ही गोष्ठकुल, गोकुल और गुरुकुल जैसी संस्थाओं की उत्पत्ति होना प्रतीत होती है। जनजाति समुदाय में प्रचलित मान्यता के अनुसार गोटुल की उत्पत्ति पहांदी पारी कुपार लिंगो ने की। लिंगो ने सर्वप्रथम बच्चों को सेमल वृक्ष के नीचे धार्मिक तथा बौद्धिक शिक्षा दी और इसी प्रकार गोटुल की शुरुआत हुई।
समाजशास्त्री ए. सी. हडन के अनुसार गोटुल में युवक-युवतियों को सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक जीवन यापन करने की शिक्षा मिलती है। इसी शिक्षा को प्राप्त करने के लिए युवक-युवतियां गोटुल में सोते हैं, गोटुल की देखभाल करते हैं, सफाई करते हैं, आग जलाने के लिए लकड़ियां लाते हैं और अपने से बड़ों को सेवा जोहार करते हैं।
समाजशास्त्री एस. सी. राय के अनुसार गोटुल नवयुवकों को सामाजिक और अन्य कर्तव्यों का प्रशिक्षण देने के लिए एक उपयोगी पाठशाला है। इसलिए गोटुल को युवाओं का प्रशिक्षण स्थल भी कहा जाता है।
गोंड समुदाय के सामाजिक बुद्धिजीवियों का कहना है कि गोटुल को लिंगो ने इसलिए आरंभ किया था कि अपने समुदाय के बच्चों को उचित शिक्षा दी जा सके। गोटुल में छोटी आयु के सदस्यों को सम्मानित जीवन, व्यवहार, अनुशासन और सामुदायिक आचरण सिखाया जाता है।
गोटुल शिक्षा का केंद्र है, जहाँ अविवाहित युवा लड़के-लड़कियां मनोरंजन करते हैं, अच्छी शिक्षा प्राप्त करते हैं और अपने भावी जीवन को आदर्श बनाने के लिये ज्ञान प्राप्त करते हैं। अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का पाठ गोटुल में ही पढ़ाया जाता है। नृत्यगान गोटुल का प्राण है। हर रात गोटुल का आँगन युवा लड़के-लड़कियों के नृत्य गीतों से मुखर होता है।
गोटुल एक अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण का केंद्र है। जनजाति समुदाय की सामाजिक व्यवस्था की सबसे शक्तिशाली युवा संस्था गोटुल है। यह गांव की सम्पत्ति मानी जाती है और इसका निर्माण गांव के लोगों की मेहनत से होता है। इसका निर्णय पूरा गाँव अपनी पारंपरिक ग्राम सभा से करता है।
लेखक मोतीराम कंगाली के अनुसार गोटुल संयुक्त गोंडी शब्द है, जो गो और टुल इन दो शब्दों के मेल से बना है। गो यानी गोंगो, अर्थात ज्ञान, शिक्षा, विद्या; और टुल यानी ठिया, ठाना, स्थान, स्थल, केंद्र। इस तरह गोटुल का अर्थ गोंगोस्थल, विद्यास्थल और शिक्षाकेंद्र होता है।
- अनुशासन
- सेवा जोहार
- नृत्य-गान
- रीति-रिवाज
- धार्मिक शिक्षा
- शारीरिक विकास
- कला और कौशल
2 गोटुल का उद्देश्य
गोटुल का उद्देश्य युवक-युवतियों को संस्कारवान बनाना और अंततः वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर समाज के योग्य सदस्य की जिम्मेदारी निभाने लायक बनाना है। किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही गांव के युवक-युवतियां गोटुल में जाने लगते हैं, जहाँ उन्हें अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा की शिक्षा दी जाती है।
जीवन उपयोगी विषयों की शिक्षा उम्र के विकास के साथ सहज रूप में दी जाती थी। इन विषयों में खेती, शिकार, वनोपज संकलन, विविध शिल्प, नृत्य, संगीत और जीवन-व्यवहार से जुड़े विषयों का समावेश होता था।
गोटुल में सम्मिलित सदस्य अपनी रुचि अनुसार कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। कोई नृत्यगान में, कोई बंशी बजाने में, कोई टोली बनाकर पहेलियाँ पूछने में, कोई लोक कथाएं सुनने में और कोई चित्र बनाने में रुचि रखता है। नृत्यगान, कथा और कहानियों के माध्यम से जीवन में बहुत कुछ सीखा जाता है।
लेखक मोतीराम कंगाली के अनुसार प्राचीन काल में कोया समुदाय के मानसिक विकास, आचार-विचार, भावना, चरित्र, इच्छा शक्ति, अनुकरण शक्ति, तर्क शक्ति और गुणग्राह्य क्षमताओं का विकास गोटुल में किया जाता था। शारीरिक विकास के लिए खेलकूद, तीर-कमान, मल्ल, मुष्टि, लाठी-काठी आदि विद्या की शिक्षा दी जाती थी।
संक्षेप में गोटुल की शिक्षा से कोया समुदाय के बच्चे सुशील, सभ्य, स्वयंपूर्ण, अनुशासित और होनहार बनते थे। पारी कुपार लिंगो का उद्देश्य बच्चों को बचपन से ही नैतिक, सामुदायिक और धार्मिक मूल्यों से जोड़कर आदर्श नागरिक बनाना था।
3 गोटुल के नियम
गोटुल की बनावट स्थानीय परिवेश के आधार पर की जाती है। गोटुल के लिए एक विशेष स्थल होता है, जो गांव से अलग खुले मैदान में, गांव के एक कोने में या कहीं-कहीं गांव के मध्य भाग में मिट्टी, लकड़ी, पत्थर और घास-फूस से बना मजबूत घर होता है।
भारत में स्थित गोटुल के सदस्यों से संबंधित नियम प्रायः एक जैसे ही हैं। फिर भी स्थान विशेष और वातावरण के आधार पर इन नियमों में परिवर्तन और विविधता मिलती है।
बस्तर क्षेत्र के गोटुल में 7 वर्ष से 16 वर्ष की आयु तक के युवक-युवती प्रवेश ले सकते थे। विवाह के बाद विवाहित दंपति का गोटुल में रहना वर्जित था, परंतु गोटुल का मुखिया उनसे यह वचन जरूर लेता था कि वे अपनी संतान को गोटुल अवश्य भेजेंगे।
- छोटी आयु के सदस्यों को आग जलाने के लिए लकड़ी की व्यवस्था करनी होती थी।
- सदस्यों को संदेश वाहक का कार्य, गोटुल की साफ-सफाई और बड़ों की आज्ञा माननी होती थी।
- सभी सदस्यों को अपने से बड़ों के प्रति सम्मान और प्रणाम करने का नियम था, जिसे सेवा जोहार कहा जाता है।
- निर्धारित तिथि पर गोटुल के देवी-देवताओं की पूजा में सभी का सम्मिलित होना आवश्यक था।
गोटुल की सेवा गाँव के लिए सराहनीय मानी जाती है। इसी कारण हर माता-पिता अपनी संतान को यौवनावस्था की दहलीज पर पहुँचते ही गोटुल की ओर भेजते थे, ताकि वे अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का पाठ पढ़ें।
4 गोटुल के सदस्य एवं पदाधिकारी
अलिखित गोटुल संविधान का सर्वोच्च पद "मुकवान" का होता है। कहीं-कहीं गोटुल के मुखिया को "सिरदार" भी कहा जाता है। यह पद अविवाहित सदस्य को दिया जाता है और विवाह के बाद उसके स्थान पर दूसरे सदस्य की नियुक्ति की जाती है।
मुखिया का आदेश सभी सदस्य मानते हैं। सिरदार या मुकवान का चुनाव गोटुल के सभी सदस्यों की राय से मौखिक रूप से किया जाता है। युवतियों में सर्वोच्च पद को "बेलोसा" कहा जाता है। गोटुल की युवतियों को "गोटुल लया" और युवकों को "गोटुल लायोर" कहा जाता है। इन्हें क्रमशः "मोटीयारी" और "चेलिक" के नाम से भी जाना जाता है।
सैवाल
गोटुल की सफाई करना और अन्य सदस्यों से करवाना। इसे झरिया या सफाईगार भी कहा जाता है।
मुसवाल / मुसवान
गोटुल की साज-सज्जा, दीवारों पर लिपाई-पुताई और चित्रकारी करवाना।
दीवान
सभी सदस्यों पर निगरानी रखना। इसे केपाल भी कहा जाता है।
कोटवार
सभी सदस्यों की उपस्थिति रखना। इसे चालान भी कहा जाता है।
सिमदार
गोटुल की लड़कियों की देखरेख करना। इसे जमादार भी कहा जाता है।
चालकी
त्योहारों, पर्वों और उत्सवों पर कार्यक्रम आयोजित करना।
सिपाही
गोटुल और गाँव की रात्रि में रखवाली करना। इसे नार केपाल भी कहा जाता है।
बईगा / बैगा
स्थानीय जड़ी-बूटियों के आधार पर गोटुल और गाँव के बीमार व्यक्तियों का उपचार करना।
5 आधुनिक गोटुल की परिकल्पना
आज के जमाने में प्राचीन गोटुल संस्थाओं की जो स्थिति दिखाई देती है, वह प्राचीन काल में ऐसी नहीं थी। विदेशियों के आक्रमण और बाहरी समुदायों के हस्तक्षेप से कोया वंशीय गोंड समुदाय की सामुदायिक, पुनेमी और आर्थिक व्यवस्था प्रभावित हुई। इसलिए आज अधिकांश क्षेत्रों में प्राचीन गोटुल संस्थाएँ नष्ट हो चुकी हैं।
इसके बावजूद यदि जनजाति कोया समुदाय को अपनी अस्मिता कायम रखकर उन्नति साध्य करनी है, तो हर गाँव में आधुनिक गोटुलनुमा शिक्षा केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है। ऐसे केंद्रों में भाषा, संस्कृति, पुनेम की शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त होनी चाहिए।
इसी परिप्रेक्ष्य को लेकर जबलपुर जिले के सभी गांवों में NGO Gtec Foundation और वेबसाइट Gtec Jabalpur (gtecjabalpur.org) के माध्यम से आधुनिक गोटुल की स्थापना किये जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।
6 संकलनकर्ता एवं स्रोत
संकलनकर्ता: केसु दादा जमगांव
- आदिवासियों के गोटुल, लेखक डॉ. नारायण चौरे, विश्वभारती प्रकाशन।
- येरमिहत्तना एक महान गोटुल, लेखक गोंडवाना ता पठारी, प्रकाशक पुनेम शोध संगत।
- पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन, लेखक मोतीराम कंगाली, प्रकाशक चन्द्रलेखा कंगाली।